बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो गायब है हाजिर भी
जो मंज़र है नाज़िर भी
Dr-Shadab Alam
General physician
कश्तियाँ सबकी किनारे पे पहुँच जाती हैं
नाख़ुदा जिनका नहीं उनका ख़ुदा होता है
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हुए नामवर बे-निशाँ कैसे कैसे
ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे
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कौन उठाएगा तुम्हारी ये जफ़ा मेरे बाद
याद आएगी बहुत मेरी वफ़ा मेरे बाद
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तुमको आता है प्यार पर ग़ुस्सा
मुझको ग़ुस्से पे प्यार आता है
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मुश्किल बहुत पड़ेगी बराबर की चोट है
आईना देखिएगा ज़रा देख-भाल के
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हँस के फ़रमाते हैं वो देख के हालत मेरी
क्यूँ तुम आसान समझते थे मुहब्बत मेरी
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ख़ंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम ‘अमीर’
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है
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गाहे गाहे की मुलाक़ात ही अच्छी है ‘अमीर’
क़द्र खो देता है हर रोज़ का आना जाना
कुछ लोग इतने कमीन , लालची और बेशर्म होते हैं कि वें मालों दौलत के सामने रिश्तों को कुचलने में ज़रा भी नही हिचकिचाते , बाकी वें ईमान का चोला बड़ी बेशर्मी के साथ ओढ़े भी रहते हैं ।
Look cool , but
Play hot.........
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
बा-हज़ाराँ इज़्तिराब ओ सद-हज़ाराँ इश्तियाक़
तुझ से वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है
बार बार उठना उसी जानिब निगाह-ए-शौक़ का
और तिरा ग़ुर्फ़े से वो आँखें लड़ाना याद है
तुझ से कुछ मिलते ही वो बेबाक हो जाना मिरा
और तिरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है
खींच लेना वो मिरा पर्दे का कोना दफ़अ'तन
और दुपट्टे से तिरा वो मुँह छुपाना याद है
जान कर सोता तुझे वो क़स्द-ए-पा-बोसी मिरा
और तिरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है
तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़-राह-ए-लिहाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है
जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो कुछ तुम को भी वो कार-ख़ाना याद है
ग़ैर की नज़रों से बच कर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तिरा चोरी-छुपे रातों को आना याद है
आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़
वो तिरा रो रो के मुझ को भी रुलाना याद है
दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तिरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है
आज तक नज़रों में है वो सोहबत-ए-राज़-ओ-नियाज़
अपना जाना याद है तेरा बुलाना याद है
मीठी मीठी छेड़ कर बातें निराली प्यार की
ज़िक्र दुश्मन का वो बातों में उड़ाना याद है
देखना मुझ को जो बरगश्ता तो सौ सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है
चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
शौक़ में मेहंदी के वो बे-दस्त-ओ-पा होना तिरा
और मिरा वो छेड़ना वो गुदगुदाना याद है
बावजूद-ए-इद्दिया-ए-इत्तिक़ा 'हसरत' मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का वो फ़साना याद है
25/03/2024
पहले घर पर नेमतख़ाना हुआ करता था जो मुख्तलिफ नामों से जाना जाता था जैसे नियामत खाना या गंजीना भी कहा जाता था।
लकड़ी का, जाली लगा रहता था; दरवाज़े में ताला लगाने की जगह होती थी। बहुत ही नेमतें हुआ करती थी उसमें।
जब बचपन में घर पर कुछ भी ख़ास बनता था, तो अम्मी हम लोगों के एक तरफ़ा हमले से बचाने के लिए उसमें रख दिया करती थीं, और उसमे ताला लगा दिया जाता था।
पर अब तो ना ही नेमतख़ाना है। और ना ही उसके ताले को खुलवाने की जद्दोजेहद। कुछ हम बदल गए और कुछ कल्चर। रकाबी भी प्लेट हो गया ...
ज़िन्दगी में कभी भी एक ही सांप आपको दो बार ना काटे इसका ध्यान रखना चाहिए।
हमने भी कई आस्तीन के सांप पाल पोस कर बड़े किए हैं ।
15/12/2022
Habiba
15/12/2022
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