SHAKTIMAAN :- EK MAHANAYAK || PART - 1 ||
Bachpan Century
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BACHPAN KI KUCHH YAAD
बुंदेलखंड की पावन माटी और केन नदी के सौंदर्य को समेटे, सिंघन गाँव (सिंधन गाँव) और केन नदी की पृष्ठभूमि पर आधारित एक सुंदर कविता नीचे दी गई है:
सिंधन गाँव की केन नदी
सिंधन गाँव के आँगन में, जो कल-कल बहती जाती है,
वो केन नदी बुंदेलखंड की, सदियों की गाथा गाती है।
मखमली रेत, वो शांत किनारा, घाटों पर चंचल पानी है,
इस पावन जल की लहर-लहर में, छिपी कोई कहानी है।
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भोर भये जब सूरज अपनी, लाली इस पर बिखराता है,
तब केन नदी का कण-कण जैसे, सोने सा चमचमाता है।
गाँव के पंछी चहक-चहककर, इसके तट पर आते हैं,
और चरवाहे अपनी गैया को, शीतल जल पिलवाते हैं।
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पहर दुपहरी इसकी छाया में, थका किसान सुस्ताए,
इसकी ठंडी-मीठी बयार, हर मन की तपन बुझाए।
शाम ढले जब मंदिर में, शहनाई-शंख की तान उठे,
तब केन मैया की आरती से, सिंधन का कोना-कोना गूंज उठे।
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यह केवल बहता पानी नहीं, सिंधन की ये जीवनधारा है,
इसके आँचल में पला-बढ़ा, हर एक गाँव का प्यारा है।
युग बदले, इतिहास बदला, पर इसकी धार नहीं बदली,
सिंधन गाँव की शान है केन, सदियों से बहती निर्मल-उजली।
WRITTER :- D K Pandit Sanatani
सिंधन कलां मेरा गाँव.........
हरी-भरी फसलों की चादर, अपनों का है यहाँ बसेरा,
जहाँ भोर की पहली किरण से, होता है सुंदर सवेरा।
मन को जो असीम सुकून दे, ऐसा है इसका हर ठाँव,
सारे जग से न्यारा है भाई, सिंधन कलां मेरा गाँव ।
पीपल और बरगद की छाँव में, कटती हैं जहाँ दोपहरें,
खेतों की पगडंडियों पर, चलती हैं यादों की लहरें।
बड़ों का आशीर्वाद यहाँ है, छोटों का निश्छल प्यार,
हर मौसम में जहाँ थिरकता, खुशियों का अनुपम त्योहार।
माटी की सोंधी सी खुशबू, बहती है पुरवाई में,
सच्चा सुख और चैन छुपा है, इसकी ठंडी परछाई में।
शहरों की इस चकाचौंध में, जो न मिलता वो सुकून,
इसकी गलियों में मिलता है, जीने का असली जूनून।
बदले चाहे वक्त कितना भी, यह न अपनी रीत भुलाए,
जो भी आए इसके आँगन, वो यहीं का होकर रह जाए।
सिर झुकता है इस माटी को, जिससे मिला मुझे यह नाम,
मेरी रग-रग में बसता है, सिंधन कलां मेरा गाँव |
WRITTER :- D K Pandit Sanatani
CREATE BY :- Bachpan Century
31/05/2026
यह वीरगाथा कविता भारतीय टेलीविजन के सबसे पहले और महानतम सुपरहीरो शक्तिमान और उसके परम शत्रु, अंधेरे के स्वामी तमराज किलविश के बीच के उस महासंग्राम को बयां करती है, जिसने हमारी बचपन की यादों को संजोया है।
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महागाथा: प्रकाश VS अंधकार
जब-जब फैला धरा पर पाप, बढ़ा अनाचार का साया,
तब-तब मानवता की रक्षा को, एक दिव्य तेज जग में आया।
अंधकार का बनकर राजा, जो कलयुग को डसने आया था,
"अंधेरा कायम रहे" का नारा, जिसने हर कोने में फैलाया था।
वह था पापी, वह था क्रूर, नाम था उसका तमराज किलविश,
रक्त रंजित जिसकी आँखें थीं, रग-रग में भरा हुआ था विष।
पंचतत्वों की शक्तियों को छीन, वो सृष्टि को झुकाना चाहता था,
सत्य, न्याय और धर्म की ज्योत को, वो सदा के लिए बुझाना चाहता था।
"अंधेरा कायम रहे" की गूंज जब ब्रह्मांड में डोली,
तब सूर्यवंश के योगियों ने मिलकर एक नई शक्ति खोली।
तभी उठा एक महापुरुष, जो पंचतत्व की काया था,
नफरत के उस घोर तिमिर में, जो बनकर उजाला आया था।
घूमा चक्रव्यूह सा वो, अंबर से धरती डोल उठी,
पापियों के सीने में मानो, मौत की भाषा बोल उठी।
शक्तिमान! शक्तिमान! शक्तिमान! का जयघोष हुआ,
अधर्म की उस लंका में, असुरों को काल का बोध हुआ।
ना कोई गन, ना कोई गैजेट, उसकी शक्ति अंतर्मन की थी,
साधारण सा 'गंगाधर' वो, पर काया उसकी फौलाद की थी।
लड़ा वीर वो निर्भय होकर, किलविश की मायावी चालों से,
कपाला , जैकाल और जोंगा जैसे, खूंखार काल के गालों से।
जब-जब किलविश ने वार किया, अधर्म का खंजर ताना था,
तब-तब वीर के चक्रव्यूह ने, उसे घुटनों पर लाना जाना था।
यह वीरगाथा है उस नायक की, जिसने हमको जीना सिखाया,
"छोटी-छोटी मगर मोटी बातें" कहकर, सही मार्ग दिखलाया।
आज भी जब अन्याय बढ़ेगा, सत्य का सूरज चमकेगा,
किलविश का हर अंधकार, शक्तिमान के तेज से बिखरेगा।
WRITTEN BY :- D K Pandit Sanatani
MUKESH KHANNA
रूप नगर चंद्रमुखी राज्य (कविता)
सज कर बैठी रूप की नगरी, महक रही है कोमल क्यारी,
जहाँ चांदनी रातों में बहती, रस की अविरल धारा प्यारी।
ऊँचे-ऊँचे महल सुनहरे, और नीलम का राज-सिंहासन,
रूप नगर का वैभव ऐसा, देख चकित रह जाए हर मन।
राज कर रही चंद्रमुखी वहाँ, जिसके मुख पर शशि का डेरा,
आँखों में गहरी बुद्धिमत्ता, और जुल्फों में साँझ का घेरा।
न्याय और मर्यादा जिसकी, इस पावन नगरी की ढाल है,
दुश्मन काँपे देख के जिसको, ऐसा उसका शौर्य विशाल है।
पहरेदार खड़े सीमाओं पर, ऐयारों का पहरा भारी,
तिलिस्म और जादू से रक्षित, यह सुंदर नगरी अति न्यारी।
छल और कपट टिक न पाएँ यहाँ, ऐसा न्याय का चक्र चलता,
चंद्रमुखी के इस पावन राज्य में, हर दिन नया सवेरा ढलता।
धन्य-धन्य यह रूप नगर है, धन्य यहाँ की न्याय-कहानी,
इतिहासों के पन्नों में अमर रहेगी, चंद्रमुखी रूप की रानी!
WRITTEN BY :- D K Pandit Sanatani
30/05/2026
भारत का सबसे पहला सुपरहीरो शक्तिमान , 1997 से 2005 दूरदर्शन में प्रसारित हुआ एक टीवी सीरियल जो 90s के बच्चों को बहुत पसंद आता था शक्तिमान जो सत्य का एक योद्धा था और रामराज किलविश जो अंधेरे का राजा था इन दोनों के बीच की तकरार पर आधारित एक छोटी सी कविता
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महागाथा: प्रकाश vs अंधकार
जब-जब फैला धरा पर पाप, बढ़ा अनाचार का साया,
तब-तब मानवता की रक्षा को, एक दिव्य तेज जग में आया।
अंधकार का बनकर राजा, जो कलयुग को डसने आया था,
"अंधेरा कायम रहे" का नारा, जिसने हर कोने में फैलाया था।
वह था पापी, वह था क्रूर, नाम था उसका तमराज किलविश,
रक्त रंजित जिसकी आँखें थीं, रग-रग में भरा हुआ था विष।
पंचतत्वों की शक्तियों को छीन, वो सृष्टि को झुकाना चाहता था,
सत्य, न्याय और धर्म की ज्योत को, वो सदा के लिए बुझाना चाहता था।
"अंधेरा कायम रहे"की गूंज जब ब्रह्मांड में डोली,
तब सूर्यवंश के योगियों ने मिलकर एक नई शक्ति खोली।
तभी उठा एक महापुरुष, जो पंचतत्व की काया था,
नफरत के उस घोर तिमिर में, जो बनकर उजाला आया था।
घूमा चक्रव्यूह सा वो, अंबर से धरती डोल उठी,
पापियों के सीने में मानो, मौत की भाषा बोल उठी।
शक्तिमान शक्तिमान शक्तिमान का जयघोष हुआ,
अधर्म की उस लंका में, असुरों को काल का बोध हुआ।
ना कोई गन, ना कोई गैजेट, उसकी शक्ति अंतर्मन की थी,
साधारण सा 'गंगाधर' वो, पर काया उसकी फौलाद की थी।
लड़ा वीर वो निर्भय होकर, किलविश की मायावी चालों से,
कपाला , जैकाल और जोंगा जैसे, खूंखार काल के गालों से।
जब-जब किलविश ने वार किया, अधर्म का खंजर ताना था,
तब-तब वीर के चक्रव्यूह ने, उसे घुटनों पर लाना जाना था।
यह वीरगाथा है उस नायक की, जिसने हमको जीना सिखाया,
"छोटी-छोटी मगर मोटी बातें" कहकर, सही मार्ग दिखलाया।
आज भी जब अन्याय बढ़ेगा, सत्य का सूरज चमकेगा,
किलविश का हर अंधकार, शक्तिमान के तेज से बिखरेगा।
29/05/2026
विजयगढ़: तिलिस्म की नगरी (Vijaygarh: Tilism ki Nagri)
सदियों का रहस्य छुपाए, खड़ा आज भी मौन है,
विजयगढ़ के इस तिलिस्म को, समझ सका यहाँ कौन है?
काले पत्थरों की दीवारें, और हवाओं में इक सरसराहट,
लगता है जैसे थम गई हो, किसी ऐयार की आहट।
घने जंगलों के बीच छुपा, यह मायावी एक संसार है,
कदम-कदम पर धोखा यहाँ, और मौत का पहरेदार है।
कहीं गुफाएं भूल-भुलैया, कहीं खजाने का है द्वार,
बिना किताब-ए-तिलिस्म के, मुमकिन नहीं इसे पाना पार।
चंद्रकांता की यादें महकतीं, वीरेंद्र सिंह का स्वाभिमान,
क्रूर सिंह की साजिशें रोतीं, ऐयारों का ऊँचा नाम।
मदहोश करती चुनार की गंध, और तिलिस्मी खंजर की धार,
खुलते हैं बंद दरवाज़े खुद ही, जब होता है मंत्रों का वार।
रात ढले जब इस नगरी में, जादू अपना रंग दिखाता है,
सूखा सा वो पुराना कुआँ भी, फिर से ज़िंदा हो जाता है।
इतिहास और परिकल्पना का, यह अद्भुत और अनोखा संगम है,
विजयगढ़ की इस माटी में, आज भी छुपा एक तिलिस्म है।
विजयगढ़ किला चंद्रकांता और वीरेंद्र सिंह के प्रेम की अनमोल निशानी है जो इतिहास पन्नो में दब चुकी है । इतिहास के बहुत ऐसे तथ्य है जो नवागढ़ विजयगढ़ और चुनारगढ़ जो इतिहास से मिटा दिया गया है ये ऐतिहासिक धरोहर जो आज ध्वस्त हो चुकी है
29/05/2026
रामानंद सागर जी द्वारा निर्मित संपूर्ण रामायण जो सभी भारतीय की दिल में बस गई उस कृति के एक छोटे। से आवरण सीता हरण की बाद श्री राम और माता सीता विरह या वियोग
एक ओर व्याकुल अवध के राजा, आँखों में नीर बहाते हैं,
छोड़ के सारे राजसी सुख, जो कुश की सेज सुलाते हैं।
भूल गए वो अपनी सुध-बुध, राघव बस सुध लेते वन की,
पूछ रहे हैं हर तरु-वर से, "कहाँ छुपी सिया मेरे मन की ।
यह विरह ग्रन्थ की आदि कथा, जो हर पत्ता दुहराता है,
प्रभु राम का पावन प्रेम यहाँ, अश्रु की धार बन जाता है।
दूसरी ओर अशोक वाटिका, दुखों का पहरा भारी है,
राक्षसियों के क्रूर शोर में, बैठी जनक-दुलारी हैं।
छू न सकी लंका की काया, उनके पावन चन्दन को,
मूँद के आँखें याद कर रहीं, वो राघव के बन्धन को।
एक श्वास में 'राम' लिखा है, दूजी श्वास में 'राघव' है,
उनके बिना यह सोने का गढ़, तिनके जैसा वैभव है।
हरी घास की एक तीली को, अपनी ओट बनाती हैं,
दशशीश के दम्भ को पल में, तृण-समान ठुकराती हैं।
नयन मूँदते ही दिख जाता, वो पंचवटी का आँगन है,
जहाँ हाथ पकड़कर राघव ने, मोहा था मिथिला का मन है।
अब बीच में गहरी नदियाँ हैं, और लाँघना भारी सागर है,
पर दोनों के घट में छलका, बस एक प्रेम का गागर है।
यह विरह नहीं, यह साधना है, जो मर्यादा को गढ़ती है,
हर एक सिसकी, हर एक आँसू से, जग की पावनता बढ़ती है।
मिलन होगा, यह निश्चित है, बस समय का पहरा भारी है,
इस महा-वियोग की अग्नि में, तपती सिया और त्रिपुरारी हैं।
24/05/2026
आज के बच्चों के लिए iPhone और PlayStation होंगे…
लेकिन 90s वालों का असली स्वैग तो यही Brick Game था। 😎🎮
जिसके पास ये गेम होता था, वो मोहल्ले का VIP बच्चा माना जाता था। 😂
पूरा दिन टेट्रिस खेलना, हाई स्कोर बनाना और दोस्तों को चैलेंज देना… यही हमारी गेमिंग दुनिया थी। ❤️
उस समय ना HD ग्राफिक्स थे, ना ऑनलाइन गेम्स… फिर भी जो मजा इस छोटे से गेम में आता था, वो आज के महंगे मोबाइल में भी नहीं मिलता। 🥹
बैटरी खत्म हो जाए तो दिल टूट जाता था, और नई सेल डालते ही खुशी वापस आ जाती थी। 😄
सच कहें तो हमारी खुशी बहुत छोटी-छोटी चीज़ों में छुपी होती थी।
90s का बचपन इसलिए खास था क्योंकि तब खेल सिर्फ टाइमपास नहीं, यादें बनाने का जरिया था। और ये Brick Game… वो याद आज भी दिल में जिंदा है। 🔥
बताओ, आपने इसमें सबसे ज्यादा कौन सा गेम खेला था? 😍👇
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