04/07/2020
!! नाभिसंस्थान !!
परमपिता परमेश्वर के अभौतिक/निराकार शरीर में जैसे जीवन से युक्त यह पृथ्वी ग्रह स्थित है , वैसे ही अन्य समस्त ग्रह , आकाशगंगाएं और यह पूरा ब्रह्मांड विद्यमान है...ठीक ऐसे ही मनुष्य समेत समस्त चराचर जीवन से युक्त है !
🚩 यत्र पिंडे , तत्र ब्रह्मांडे 🚩
हमारे जीवित शरीर में भी एक जीवन श्रृंखला बसती है , असंख्य #जिवाणु इस भौतिक शरीर में आश्रय पाते हैं , सामान्यतः जिनके जिनके प्रति हम उदासीन एवं अनभिज्ञ रहते हैं !
ऐसा ही एक जीवाणु #स्त्री के शरीर से जुड़ता है , यहां ध्यान रहे कि मैं शब्द #रहने की से अधिक एवं महत्वपूर्ण बात कर रहा हूँ , रहना और बात हुई , जुड़ना अलग बात हुई...तो जो केवल रहता है वह जीवाणु हुआ लेकिन जो जुड़ता भी है , वह #शिशु हुआ !
यही जुड़ाव #ममता को प्रकट करता है !
स्त्री को संसार का सर्वोच्च पद #माँ बनाता है !
स्थूल शरीर विज्ञान में यही #जुड़ाव_बिंदु #नाभि_संस्थान कहलाता है , स्त्री और उसके गर्भस्थ शिशु के मध्य का सेतुबंध , शिशु और उसके जीवन के मध्य का प्राणबंध , नवजीवन और उसके निर्वाहन /विकास हेतु आवश्यक पोषण की प्राकृतिक व्यवस्था का आधारबंध भी यही नाभिसंस्थान है !
देखा जाए तो इतनी भावनात्मक व्याख्या भी हमें नाभि संस्थान की महत्ता का बोध कराने के लिए पर्याप्त है , लेकिन मानव मन िक की बीमारी से ग्रसित रहता है , सो यौगिक शरीर विज्ञानानुसार नाभिसंस्थान के ठीक पीछे एक गोलाकार (सर्पकुंडली सा) कंद है...इसी कंद से संपूर्ण शरीर में फैली हुई 72 हजार नाड़ियों उत्पन्न हुई हैं , इनमें 72 नाड़ियां प्रमुख हैं और जिनमें से 10 नाड़ियां अति महत्वपूर्ण हैं !
संपूर्ण शरीर को इन्हीं नाड़ियों द्वारा प्राण ,ऊर्जा , शक्ति का प्रवाह प्राप्त होता है , श्रेष्ठ यौगिक साधक बताते हैं कि इसी नाभिसंस्थान में #मणिपूरक_चक्र नामक सूक्ष्म चक्र स्थित होता है , जो इस शरीर में #सूर्यदेव का प्रतिनिधित्व करता है , जिससे शरीर में ताप (ऊर्जा/शक्ति/प्राण) जिसके कारण शरीर में पाचन संबंधी क्रिया गतिमान होती है , मानव शरीर में पीयूष ग्रंथि में जहां आत्मा का निवास होता है और आत्मा को शरीर पर नियंत्रण इसी चक्र से प्राप्त होता है !
शारीरिक संतुलन को उत्तम बनाये रखने के साथ अंग-प्रत्यंगों में सामंजस्य एवं नाड़ियों के कार्य संचालन व नियंत्रण में नाभिसंस्थान की भूमिका महत्वपूर्ण है ! जब तक यह संस्थान तंत्र स्वाभाविक स्थिति में रहता है , तो शरीररूपी मशीन का प्रत्येक कलपुर्जा अपना कार्य ठीक तरह से कार्य करता है...इससे मानव जीवन आनंदित होकर पूर्ण कुशलता एवं मन के साथ परिवार/समाज/देश और धर्म के क्षेत्र में #उत्पादक की भूमिका का निर्वाहन करता है !
जबकि नाभिसंस्थान में अंशमात्र विकृति आने पर शरीर की प्रमुख प्रणालियां अस्त-व्यस्त हो जाती है , शरीर रोग-ग्रस्त हो जाता है और #बोझ की भूमिका को प्राप्त होता है !
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इस बात को स्वीकार नही करता जबकि मेरे स्वयं के अनुभव रहे हैं कि अनेक रोगी कई वर्षों तक उपचार लेते रहने के बाद भी स्वास्थ्य लाभ नही ले पाए , रोगमुक्त नही हो पाए और मात्र नाभिसंस्थान को उसके स्वाभाविक रूप में लाते ही , वे चमत्कृत हुए !
शेष....नाभि संरक्षण , रोगों का निदान...साथ बने रहें !!
🎯ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि
🙏नमस्तुभयं हे महेश्वराय
🌺सुप्रभातं
✍️Baba Thakur
31/05/2020
!! सूर्यदेव एवं जीवनज्योति !!
🎯सूर्य क्या है ??
सूर्य एक महातारा है जिससे हमारी आकाशगंगा में उपस्थित समस्त गृह प्रकाशित हैं और हमारी पृथ्वी सहित अन्य ग्रहों पर भी अगर जीवन है , तो सूर्य की ऊर्जा से प्रेरित है , जीवनदायी ऊष्मा एवं ऊर्जा देने के कारण ही हमने इन्हें देव कहा अर्थात सूर्यदेव कहा !
हमारे संसार का प्रत्येक जीव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सूर्यदेव की इस प्राणदायी ऊर्जा से प्रभावित है , जो वास्तव में एक बड़े आग के गोले के रूप में स्थिर हैं !
🎯जीवनज्योति क्या है ??
हमारे ऋषियों-मुनियों(वैज्ञानिकों-मनोवैज्ञानिकों) ने लाखों वर्ष पूर्व घोषणा कर दी थी कि यत्र पिंडे , तत्र ब्रह्मांडे अर्थात जो हमारे इस छोटे से शरीर में हैं वैसा ही इस महा ब्रह्मांड में है...कोई भेद नही है !
इस तुच्छ से शरीर की प्राणशक्ति अग्नि ही है अर्थात अग्नि शांत तो मनुष्य परलोकवासी हो जाता है , देह धरी रह जाती है जिसे मिट्टी कहा जाता है !
तुच्छ शरीर में सूक्ष्म अग्नि को ही जीवनज्योति कहा गया है , जिसका रंग , रूप , आकार एवं गुण सूर्यदेव की दैनिक कलाओं से प्रभावित होकर घटता अथवा बढ़ता है...अर्थात सूर्योदय के पश्चात जैसे जैसे सूर्यदेव ऊपर चढ़ते हैं ठीक वैसे वैसे हमारे शरीर की गर्मी भी बढ़ती है और जैसे जैसे सूर्यदेव सूर्यास्त की ओर बढ़ते हैं ठीक वैसे ही हमारी जीवनज्योति भी धीमी पड़ती चली जाती है ! इसे समझने के लिए सूर्य और चंद्र के मध्य निर्भरता का सिद्धांत याद कीजिये , वही सिद्धांत यहां भी लागू होता है कि सूर्य की रोशनी से चंद्र जगमग है , अन्यथा चंद्र की स्वयं की कोई रोशनी नही है !
अब यहां कोई यह भी न समझे कि मैं सूर्य को चलायमान कह रहा हूँ , बस जो प्रत्यक्ष अनुभव होता है वैसा ही लिखने का सुख उठा रहा हूँ....अर्थात घूर्णन तो पृथ्वी का ही होता है , सूर्यदेव का नही !
शास्त्रों एवं आयुर्वेद के अनुसार यही 1 जीवन ज्योति हमारे शरीर में 13 रूपों में व्यक्त है !
🎯१...जठराग्नि
🎯२...5 भूताग्नि
🎯३...7 धातवाग्नि
आज हम यहां बात करेंगे 🎯 #जठराग्नि की...
इस मशीन रूपी शरीर को चलायमान रखने के लिए ईंधन रूप में भोजन , पानी और हवा की आवश्यकता होती है ! जिन्हें पचाने और पचाकर शरीर हेतु आवश्यक विटामिन्स , खनिज , लवण आदि की पूर्ति यही अग्नि करती है , जिसे हम जठराग्नि कहते हैं !
इसका भेद खोलना बहुत आवश्यक है , क्योंकि अधिकतर इसे जानते नही और बहुत से जानकर मानते नही हैं , और ईश्वर की मनुष्य को दी सबसे बड़ी भेंट स्वयं उसके वास्तविक मंदिर को समय से पहले नष्ट कर रहे हैं , अनावश्यक रोग..दोष आज के जीवन के महत्वपूर्ण अंग हो चलें हैं ! विडंबना यह है कि बहुतों के लिए तो रोग और उसके कीमती उपचार सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय बन चुकें हैं !
हमारे शास्त्रों में वर्णित है कि हमारा पाचन तंत्र #कमलपुष्प के समान है , जैसे , कमल सूर्योदय से खिलना शुरू करता है फिर सूर्य की बढ़ती कला के साथ-साथ कमल में निखार आता चला है और सूर्यास्त के साथ ही कमल भी मुरझा जाता है ठीक वैसे हमारे शरीर की जीवनज्योति , उसमें , भी विशेषकर जठराग्नि का व्यवहार समान होता है !
सूर्योदय के समय से इसमें तेजी आई शुरू होती है और फिर सूर्यदेव के चढ़ते चढ़ते यह प्रबल होती जाती है और फिर सूर्य की घटती कला के साथ साथ यह मंद होने लगती है ! इसी गुण को हमारे ऋषियों ने परखा और हमारे भोजन के नियम-सन्नियम तय किये !
जिनमें प्रमुख हैं....
🎯सुबह-सवेरे आपका भोजन राजा सा होना चाहिए अर्थात भरपेट , गरिष्ठ भी चलेगा , दोपहर का भोजन राजकुमार सा अर्थात मध्यम , अपेक्षाकृत हल्का एवं रात्रि का भोजन रंक के समान करना चाहिए अर्थात नाममात्र का और प्रकृति में बिल्कुल हल्का ! इस प्रकार से लिया गया भोजन आपको कभी हानि नही पहुंचा सकता , शरीर को रोगी नही बनाएगा !
इस नियम का कारण सूर्य से प्रेरित जठराग्नि का व्यवहार है , जब सांझ होते होते आपकी जठराग्नि मंद हो जाती है तब आपके द्वारा पाया गया भरपेट गरिष्ठ भोजन पचना बंद हो जाता है , जिससे आप अनेक रोगों की चपेट में आना शुरू कर देते हैं !
आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी के झूठे दावों के चक्कर में लोगों ने अपना दैनिक जीवन बिलकुल उलट नियमों के साथ जीना अपनी मजबूरी बताया है जबकि मेरा मानना है कि स्वयं मैं ही क्यों न हूँ एक बहुत बड़ी आबादी के लिए यह केवल बहाने हैं , निपट फट्टे हैं ! मजबूरों की संख्या बहुत बड़ी नही है , बड़ी भी है तो वे फिर भी शरीर को अहमियत देते हैं जैसे मजदूर...अनपढ़ सही लेकिन गुणी हैं !
मैंने इस नियम को अब जीवन में उतारा है , लाभ अनुभव हो रहे हैं कुछ शुरुआती परेशानियों के बाद !...इसलिए कहता अच्छा लग रहा हूँ ! साथ ही अपने जानकारों को भी संदेश दे रहा हूँ कि जिद मत कीजियेगा , बुरा न मानियेगा अगर मैं रात्रि भोजन आपके साथ न कर पाऊं तब !
🎯पानी एवं इसके समकक्ष तरल पदार्थों को लेने के भी तरीके बनाए गए , बताए गए कि सुबह की शुरुआत आप फलों के रसों से करो , दोपहर को छाछ और रात्रि में दूध लो ! इसके पीछे भी यही कारण है कि पाचन का संबंध भी रसों से ही होता है अर्थात हमारा भोजन रस के रूप में ही पचता है , जबकि सीधा रस लेने से हमें दोहरे फायदे होते हैं पहला अंगों की मेहनत कम होती है और दूसरा सीधा पोषण प्राप्त होता है !
दोपहर को छाछ लेने का कारण यही है कि जठराग्नि तीव्रतम होती है अतः उसे नियंत्रित किया जाना आवश्यक है जिसका काम छाछ बेहतर रूप से कर पाती है ! और सांझ को आप कम भोजन लेते हैं अतः आवश्यक तत्वों की पूर्ति दूध जैसे हल्के सुपाच्य पेय से हो जाती है !
यही बात पानी पर भी लागू होती है कि पानी और अग्नि में शत्रुभाव है अतः पानी सोच-समझकर प्रयोग में लाना चाहिए !
व्यायाम के बाद ,भोजन के बाद और संभोग के तुरंत बाद पानी नही पीना चाहिए ! यह कार्य कम से कम डेढ़ से दो घँटे बाद ही करना चाहिए ! Chilled bottels से दूर रहिये ! और साधारण तापमान के पानी को भी घूंट घूंट करके लार का मिश्रण करके गले से नीचे उतारना चाहिए !
🎯ऐसे ही हवा(ऑक्सीजन) का काम अग्नि को भड़काना अतः आपको आदेश है कि सुबह व्यायाम करने चाहिए , जिसके कारण अग्नि आपकी अतिरिक्त वसा का नाश करेगी ही , साथ ही आपकी जठराग्नि को भी प्रबलता प्रदान करेगी ! श्वांस संबंधी यौगिक क्रियाएं इसी कारण सुबह करनी चाहिए ! अनेक योद्धा जो घँटों शाम को gym में जाकर लोहे से माथा फोड़ते हैं वे यही गलती करके रोगों के शिकार होते हैं कि जैविक घड़ी के अनुसार जिस समय जठराग्नि मंद हो जानी चाहिए वह उसे उसी समय भड़काते हैं !
यह उनके लिए सही है जो मंदाग्नि रोग से पीड़ित हैं !
अगर आप इन नियमों से चलेंगे तो आपको पेट संबंधी अनेक रोग पकड़ नही पाएंगे ! कब्ज , एसिडिटी , bp , गठिया , मधुमेह जैसे अनेक साध्य-असाध्य रोग केवल आपकी गलत जीवनशैली का परिणाम हैं ! साथ ही इन नियमों के बलबूते न केवल आपकी immunity strong अपितु आपको corona जैसे झंडू रोगों से भी डरने की आवश्यकता नही पड़ेगी , चेहरे पर तेज आएगा सो अलग...वह तेज जो कभी ऋषियों के चेहरे पर था !
यही अतुल्य भारत को पुनर्जीवित करने का उपाय है कि पुरातन भारत को पुनः गढ़ना भी तो पड़ेगा !
🎯ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि
🙏नमस्तुभ्यं हे महेश्वराय
✍️Baba Thakur
🚩भोलेनाथ आपकी रक्षा करें !!
24/05/2020
!! Lockdown में तुम बहुत याद आ रहे हो !!
मेरे परिवार में २ मटके (प्रति मटका क्षमता 15 ltr) पानी की खपत प्रतिदिन है , इस कारण मैं कम से कम २-३ मटके हर साल खरीदता हूँ गर्मियों में !
लेकिन इस वर्ष अब तक यह काम नही कर पाया हूँ , फ्रिज त्यागे लगभग 25 वर्ष से ऊपर हुए...नया कौड़ियों के भाव अपनी दहलीज से दफा किया था पिताजी ने !
आइये कुछ लाभ बताते हैं आपको माटी के घड़े के बारे में कुछ विशेषज्ञों की कही और कुछ अपनी समझी समझ से ! अपनी समझ से जो बात मुझे समझ सबसे पहले आई वह यह है कि माटी को हम मां मानते हैं क्योंकि मानुष देह माटी की ही बनी है सो इससे हितकारी क्या होगा हमारे लिए !
#लाभ
१- विशेषज्ञों के अनुसार गर्मी में मटके का पानी जितना ठंडा और सुकूनदायक लगता है, स्वास्थ्य के लिए भी उतना ही फायदेमंद भी होता है। इसका तापमान सामान्य से थोड़ा ही कम होता है जो ठंडक तो देता ही है, पाचन की क्रिया को बेहतर बनाने में मदद करता है ! इसे पीने से शरीर में टेस्टोस्टेरॉन का स्तर भी बढ़ता है। वैद्य समाज मेरी बात से सहमत होगा क्योंकि माटी द्वारा हम पुरानी से पुरानी कब्ज को तोड़ने का उपाय माटी से भी करते हैं !
२-मटके का पानी ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रित रखने में आपकी मदद करता है. यह बैड कॉलेस्ट्रोल की मात्रा को कम करता है और हार्ट अटैक की संभावनाओं को भी कम कर देता है ! यह जटिल रोग वात रोगों की श्रेणी में आते हैं और इनका सबसे बेहतर उपचार है माटी का प्रयोग !
३-इसमें मृदा के गुण भी होते हैं जो पानी की अशुद्धियों को दूर करते हैं और लाभकारी मिनरल्स प्रदान करते हैं ! शरीर को विषैले तत्वों से मुक्त कर आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को बेहती बनाने में यह पानी फायदेमंद होता है।
४-मिट्टी में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होने के कारण यह शरीर में दर्द, ऐंठन या सूजन जैसी समस्या को नहीं होने देता. इतना ही नहीं, यह आर्थराइटिस बीमारी में भी बेहद लाभकारी माना जाता है !
५-एनीमिया की बीमारी से जूझ रहे व्यक्तियों के लिए मिट्टी के बर्तन में रखा पानी पीना वरदान साबित हो सकता है ! मिट्टी में आयरन भरपूर मात्रा में मौजूद होता है ! हम आपको बता दें कि एनीमिया आयरन की कमी से होने वाली एक बीमारी है !
६-सनस्ट्रोक या लू एक बहुत ही आम समस्या है जो गर्मियों में बहुत से लोगों को लगती है ! मिट्टी के बर्तनों में रखे पानी में विटामिन और खनिज शरीर के ग्लूकोज के स्तर को बनाए रखने में मदद करता है ! यह आपके शरीर को ठंडक प्रदान करता है !
७ - मटके का पानी पीना से कैंसर की बीमारी का खतरा बहुत कम हो जाता है ! घड़े का पानी गले से संबंधी बीमारियों से बचा कर रखता है और यह हमको जुकाम खांसी की परेशानी से भी बचाता है !
८- मटके का पानी पीना से पीएच संतुलन सही होता है ! मिट्टी के क्षारीय तत्व और पानी के तत्व मिलकर उचित पीएच बेलेंस बनाते हैं जो शरीर को किसी भी तरह की हानि से बचाते हैं और संतुलन बिगडऩे नहीं देते !
९- अगर आप दमा के रोगी हैं, तो भी मटके का पानी पिएं ! लकवा पेशेंट्स को भी मटके का पानी नियमित तरीके से गर्मी में पीना चाहिए ! इससे उनको फायदा मिलेगा !
१०- मटके का पानी प्राकृतिक तौर पर ठंडा होता है, जबकि फ्रिज का पानी बिजली के उपभोग से इसलिए यह आपके खर्चे को कम करेगा , जिससे आप भ्रष्टाचार के वाहक भी नही होंगे और मटके बनाने वालों को भी लाभ होगा सो अलग , अर्थात स्वदेशी का #देशी शब्द सार्थक होगा !
🎯ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि
✍️Baba Thakur
🚩नमस्तुभ्यं हे महेश्वराय
❤️महेश्वर आप सबकी रक्षा करें , कल्याण करें !
22/05/2020
Rajsuya Organic #शिलाजीत या #शिलारस
ओह्ह !
यह क्या लिख दिया मैंने... छि !
अगर एक बाप अपने बेटे को शिलाजीत खाता देख ले , तो निश्चित ही वह अपना मुंह फेर लेगा और उसकी शादी टाल देगा कि शायद अभी लड़का तैयार नही है...लोगों के अज्ञान ने #आयुर्वेद और उसकी अनुपम भेंट #शिलारस को लगभग #कंडोम सरीखा बनाकर रख दिया है !
उफ्फ ! पुनः क्षमायाचना करता हूँ लेकिन क्या करूँ ?...वस्तुस्थिति की यथार्थता यही है , लोगों के अज्ञानता की चरम अभिव्यक्ति यही है , यह षड्यंत्रकारियों द्वारा दुष्प्रचार की परमावस्था है , जो उन्होंने बहुत लंबे अरसे से आयुर्वेद के विरुद्ध चलाया है !
जबकि वास्तविकता में आयुर्वेद किसी भी अन्य #चिकित्सा_विज्ञान के विरुद्ध अधिक व्यापक , अचूक एवं समृद्ध प्रतियोगी है जो मनुष्य को उत्तम स्वास्थ्य के 3 आयाम प्रदान करता है...आरोग्यता , बचाव एवं निदान !
इसके अनमोल खजाने में इतने दिव्य मोती हैं कि आप इसपर विश्वासपूर्वक आगे बढ़ते हैं तो आरोग्य रहते हैं , मुश्किल समय में (जैसे कोरोना संकटकाल) बचाव हेतु तत्पर रहते हैं और यदि असावधानीवश आप किसी रोग के शिकार हो भी जाते हैं तो इससे पूर्णतः सुरक्षित रूप से मुक्ति पा सकते हैं !
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे पुरखों की इस महान विरासत को हमने समय के साथ भुला दिया , आज आयुर्वेद वैकल्पिक चिकित्सा विज्ञान है ! और यह निःसंदेह दुःखद स्थिति है !
आज हम बताएंगे ऐसे ही दिव्य अनमोल आयुर्वेदिक भेंट के बारे में जिसका नाम है....शिलारस अथवा शिलाजीत जबकि संस्कृत में इसका एक नाम गिरिजा है जो इसके दैवीय मूल्य को दर्शाता है !
यह एक ऐसी औषधि है जो आपको तीनों आयामों में लाभप्रदायक है अर्थात आपको आरोग्यता प्रदान करती है , बचाव हेतु तैयार करती है और रोगों में निदान हेतु मार्ग प्रशस्त करती है !
शिलारस जिसे देहाती भाषा में पत्थरों का पसीना भी कहा जाता है , जिसे विशेष प्रकार की चट्टानों से प्राप्त किया जाता है जो हिमालय तथा कुछ अन्य स्थानों पर पाए जाते हैं , जिसमें लगभग 80 से अधिक पोषक तत्व पाए जाते हैं जो हमारे पूरे शरीर को बल प्रदान करते हैं जैसे फुल्विक एसिड , आलुबुमिनोइड्स, राल, वसाम्ल, बेंज़ोइक तथा हूपुरिक एसिड आदि होते हैं !
आइये इसके चुनिंदा लाभ के बारे में आपको जानकारी देते हैं !
1...मेधाशक्तिवर्धक :- फुल्विक एसिड एक ऐसा तत्व है जो आपकी मस्तिष्क क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि करता है , इसकी प्रचुरता से आपकी स्मरणशक्ति बेजोड़ हो जाती है ! इस प्रकार यह अलझाइमर्स अर्थात स्मृति विलोपन जैसे असाध्य माने जाने वाले रोग में बेहद कारगर है !
2...रोग प्रतिरोधक :- शिलारस में अनेक ऐसे तत्व प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं जो का कार्य करते हैं , जिससे आपकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है !
3...आयु प्रतिरोधक :- शिलाजीत एक बेहतर है , जो आपकी बढ़ती आयु को रोकने में अद्भुत रूप से सहायक है ! यह आपके झड़ते बालों को रोकता है , दांतों को मजबूत बनाता है , मांसपेशियों को बल देता है , त्वचा की झुर्रियों को रोकता है !
4...मधुमेह उन्मूलक :- मधुमेह (Diabetes/sugar) में शिलाजीत एक रामबाण सहायक औषधि सिद्ध है ! इसके निरंतर सेवन से इस रोग के उपचार एवं जोखिम को कम करने में सहायता मिलती है !
5...रक्त_शोधक :- शिलाजीत अनेक प्रकार के रक्त-संबंधी रोगों में प्रभावकारी औषधि है जैसे रक्ताल्पता , दूषितरक्त में यह अभूतपूर्व है ! इसके निरंतर सेवन से रक्त के विकार दूर होते हैं !
6...पाचनतंत्र सुधारक :- यह मनुष्य के पाचनतंत्र को उन्नत एवं सुदृढ़ करके कब्ज दूर करता है , वात-प्रकोपों में लाभ पहुंचाता है !
7...वीर्यवर्धक एवं शुद्धक :- यह लाभबिन्दु जो अंतिम होना चाहिए , दुर्भाग्य से लोगों के लिए प्रथम हो गया...यह वीर्यसंबंधी दोषों को दूर करता है , शुक्राणुओं की संख्या में वृद्धि के साथ साथ उसकी गुणवत्ता में सुधार लाता है , शीघ्रपतन आदि समस्याओं को पूर्णतः दूर करता है !
इस प्रकार इसके अनेकानेक प्रयोग हैं जिन्हें समयाभाव के कारण लिखना संभव नही है लेकिन यह संपूर्ण समाधान है मनुष्य शरीर हेतु , और हमें इसे लांच करते हुए बहुत प्रसन्नता हो रही है क्योंकि #राजसूय_शिलाजीत है 24 कैरट सोने सा शुद्ध एवं खरा , आपके आरोग्य का साथी !
🎯ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि
🙏नमस्तुभ्यं हे महेश्वराय
✍️Baba Thakur
🚩बाबा भोलेनाथ सभी का कल्याण करें !
22/05/2020
!! नेत्रों की देखभाल !!
★ औषधि
नेत्रों के लिए दो प्रकार की साधारण लेकिन प्रभावी औषधि आप प्रयोग में ला सकते हैं !
#खाने_वाली_औषधि :-
दक्खिनी मिर्च.......१० ग्राम
बादाम गिरी.........५० ग्राम
बड़ी सौंफ...........५० ग्राम
त्रिफला .................१०० ग्राम
मिश्री कुंजा..........105 ग्राम
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इन सबको बारीक पीसकर चूर्ण बनाएं , और सुबह-शाम खाली पेट 5 ग्राम दूध के साथ सेवन करें
#डालने_वाली_औषधि_1
●१....उठते ही बिना कुल्ला करें , बासी थूक अनामिका उंगली के माध्यम से लगाएं !
●२....१० रसदार आंवला लेकर उन्हें कद्दूकस कर लें , और इसमें 10 ग्राम शुद्ध गुलाबजल मिलाकर ग्राइंड करके किसी साफ सूती वस्त्र में भरकर निचोड़े और कांच की शीशी में संचय करके रख लें ! सुबह शाम एक एक बूंद आंखों में डालें , बहुत प्रभावकारी EYE DROP है !
●३...सममात्रा में नींबू , अदरक और सफेद प्याज का रस और गुलाबजल लेकर उसमें , चारों रसों के मिश्रण के बराबर शहद मिलाकर इस दृव्य को किसी कांच की शीशी में रख लें !
शेष खाने में मूंगफली , गुड़ , मूली , आंवले का मुरब्बा , दूध का प्रयोग करें !
#लगाने_वाली_औषधि
प्रति रात्रि अपने पैर धोकर तलवों पर सरसों के तेल की मालिश करें !
★योग
●1....प्रति सुबह सूर्य की पहली किरण उगते ही सूर्य दर्शन करें , और सूर्य को देखते हुए त्राटक (घूरना) करें , यह अधिकतम ३ मिनट ही करना चाहिए !
●२....शीर्षासन का 2 से 3 मिनट का अभ्यास करें !
●३....भ्रामरी प्राणायाम बहुत लाभदायक रहता है !
●४....दिन में कम से कम 5 बार ताजे पानी से इन्हें धोएं !
५....हथेलियों को रगड़कर गर्म करें , और आंखों पर रखकर सिकाई करें !
★ACCUPRESSURE POINT
●१....आंखों के चारों ओर , और कनपटी पर शुद्ध देशी गौघृत से हल्के दबाव के साथ मालिश करें !
२....हथेली पर तर्जनी और मध्यमा उंगली के संधिस्थल पर किसी पेन या पेंसिल के माध्यम से दबाएं , ऐसा एक बार में कम से कम 20 बार करें और यह क्रिया दिन में कई बार करनी चाहिए !
🎯ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि
🚩नमस्तुभ्यं है महेश्वराय
✍️Baba Thakur
❤️महेश्वर आप सभी का कल्याण करें !
19/05/2020
शब्दभेदीसंधानक ,प्रतापीवीर ,म्लेच्छसंहारक ,सनातनधर्मरक्षकसम्राट ,अतुल्यसूर्यवंशभूषणं ,दिव्याग्निजन्माकुलवंशज ,चौहानशाखारत्न ,भारतेश्वर ,सपालदक्षेश्वर ,अजयमेरु के शासक एवं दिल्लीपति राजपूत सम्राट पृथ्वीराज चौहान जी के जयंति पर्व पर सभी क्षत्रियों एवं सनातन अनुयायियों को हार्दिक बधाई संग अनंत शुभेच्छाएँ !
✍️Baba Thakur
🙏नमस्तुभ्यं हे महेश्वराय
🚩ॐ सदाशिव शिव शिव शिवाय
❤️महेश्वर सभी प्रियजनों की रक्षा करें !!
17/05/2020
!! माटी का चूल्हा और बर्तन माटी के !!
वैश्विक महामारी के बीच बात निकल आई है || स्वदेशी + स्वस्थ जीवन || की , तो हमें कृतज्ञ होना चाहिए इस महामारी के प्रति , सच माने तो जिस तरह से समाज ने अपने बड़े-बुजुर्गों और उनकी वैज्ञानिक परम्पराओं को ताक पर रखकर आपमधापी से भरी जीवनशैली में स्वयं को झोंका , वह किसी दुर्भाग्य से कम नही था , झूठी शान का चोला चढ़ाने वाला मानुष आज एक अदृश्य अदना से भय का हौव्वा मानकर घरों में कैद हुआ !!
आज विलासिता की सभी वस्तुएं जैसे फ्रिज , एसी सब तुम्हारे शत्रु के साथी अर्थात तुम्हारे शत्रु ही सिद्ध हुए , मान लो अब तो कि तुमने आस्तीन के सांप पालने में अपना जीवन लगा दिया !
आज जबकि यह सिद्ध हो चुका है , आधुनिक एवं बड़े बड़े वैज्ञानिक यह मान चुके हैं कि महाभारत काल और इससे पहले 'परमाणु आयुधों' , 'अक्षय ऊर्जा से चलित यान ' आदि महान चमत्कारों का अस्तित्व रहा है ....लेकिन पूर्वजों ने आपकी तरह भोग-विलास को नही चुना !
उन्होंने विज्ञान के चमत्कारों के साथ साथ प्रकृति को सदैव आदर-सम्मान दिया और इसे पूज्यनीय माना , स्वस्थ प्रकृति को धरोहर रूप में अपने वंशजों को सौंपते रहे और अंततः यह हाथ आई नई पीढ़ी के....कहा जा सकता है कि पिछली 4 से 5 पीढ़ियों ने विज्ञान के साथ कर्म का नाता तोड़कर अकर्म (भोग) से नाता जोड़ लिया !
अनेकों बार यह खोखली आधुनिकता ओढ़ी गयी और अनेकों बार इसे तुम पर षड्यंत्रों की आड़ में ओढ़ाया गया !
इसी क्रम में आज बात करेंगे !! माटी के चूल्हे और बर्तन !! को लेकर...
भोजन मनुष्य रूपी मशीन में ईंधन सा मोल रखता है , भोजन न मिलने पर मनुष्य एक समयसीमा के बाद असहाय/निढाल होकर मृत्यु तक को प्राप्त हो सकता है , वहीं पौष्टिक भोजन अमृत (अमर तत्व) की भांति जानिए , जिससे मनुष्य की आयु में बृद्धि होती है , उसके जीवन में आवश्यक ऊर्जा की प्राप्ति होती है !
जैसा कि मैंने पहले ही कहा , कि... परमाणु आयुध , महान शिल्पकृति भवनों , अक्षय ऊर्जा से चलने वाले विमानों वाले दौर में क्या भोजन को पकाने के लिए आधुनिक मशीनों का आविष्कार होना मुश्किल था...नही लेकिन वे लोग एक बात भली-भांति जानते थे कि विज्ञान को सामान्य जीवन की परिधि में प्रवेश कराने का अर्थ है...मनुष्य की निष्क्रियता और धीमी मौत की ओर संचलन !
इसीलिए जहां आवश्यक हुआ वहां मशीनों को शामिल किया गया और जहां आवश्यक नही था वहां जीवन को प्रकृति के समीप ही रहने दिया ! इसी कारण पुराने लोग अधिक सक्षम , कुशल , निरोग ,सुगठित , एकाग्र एवं निपुण हुआ करते थे !
क्या आप जानते हैं , मानुष देह पंच तत्वों से निर्मित बताई जाती है जिसमें से एक तत्व है "माटी"...अब उन लोगों की जीवनशैली की महानता मान लें या अपनी तसल्ली को उन्हें पिछड़ा हुआ कह लें कि वे हमेशा से जानते थे कि भोजन को माटी की सहायता से भोज्य योग्य तैयार करने का अर्थ है...भोजन की समृद्धता !
जी हां , माटी के चूल्हे पर माटी के बर्तनों में पकाया गया भोजन जहां उच्च गुणवत्ता का होता है , वहीं स्वाद और सोंधी महक में इसका कोई जवाब ही नही था...आज आधुनकि विद्वान बताते हैं कि मिट्टी के बर्तनों में पकाए गए भोजन में 100 % पौषक तत्व शामिल होते हैं , वहीं एल्म्यूनियम के पात्रों में भोजन के 87% पौषक तत्व समाप्त हो जाते हैं , पीतल में 7 % , कांसे में 3% पौषक तत्वों की हत्या हो जाती है !
तो विज्ञान के ~ अनुरूपता सिद्धांत ~ के अनुसार चलने वाले हमारे पुरखों ज्ञान के मामले में हमसे कहीं अधिक आगे थे , शरीर एवं प्रकृति के अनुरूप ही उनके उपकरण हुआ करते थे !
आज देखिये , आपके भोजन पकाने के माध्यम क्या है ??...गैस और धातु के बर्तन
गैस अर्थात वायु अर्थात वात , हमारे शरीर में विकार का कारण माना जाता है...सीधे सीधे आपके शरीर में इससे जुड़े 80 रोगों को निमंत्रण दिया जाता है !
धातुओं के बर्तन में पौषक तत्वों की भी कमी हो जाती है (ऊपर लिख दिया है) , यहां तो वही कहावत चरितार्थ हुई न कि आसमान से गिरे और खजूर में अटके !! सो आपकी आधुनिकता खोखली ही हुईं न !!
और ऐसा नही है कि माटी के उपयोग से पौष्टिकता संबंधी लाभ ही होते थे , बल्कि इसके आध्यात्मिक लाभ भी थे , उस जमाने में अनेकों व्यस्त दिनचर्या वाली माताएं भोजन पकाने के दौरान प्रकट प्रत्यक्ष अग्निदेव को भोजन का एक भाग देकर पूज देती थीं और शायद आप जानते हों कि देवताओं को देय अग्र भोज के वाहक अग्नि देव ही हैं , यज्ञ/हवन का विज्ञान यही है ! तो उस चूल्हे में माताओं की उच्च धार्मिकता भी समाहित थी , जिसका प्रभाव भोजन पर पड़ता था...तभी तो कहते थे कि जैसा अन्न वैसा मन !!
आपको बताता चलूं , कि , बिना षड्यंत्र की बात किये james bond टाइप भाइयों के लिए बातें बेमानी सी हो जाती हैं....सो आपको अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र भी समझाते हैं इसके पीछे !
सदियों से भारतीयों के साथ उनकी प्रवीणता , आरोग्यता , निपुणता , वैज्ञानिकता के तोड़ को लेकर षड्यंत्र चल रहे हैं , जो भी आविष्कार विदेशों में भद्द पिटवा रहे थे , उन्हें भारत में प्रत्यारोपित किया गया....अनेकों उदाहरण हैं !
ऐसे ही एक षड्यंत्र आपकी रसोई में चूल्हे के साथ भी किया गया...विकल्प में दिए गए मिट्टी के तेल की बात हो अथवा गैस की !
चूल्हे में ईंधन के रूप में मुख्यतः 2 चीजें काम में लाई जाती थीं...एक लकड़ी और दूसरा गोबर के उपले !
इसके लिए आपका जुड़ाव वनों और पशुओं से बना हुआ था , यह दोनों तत्व भारतीयता की पहचान और रक्षक हुआ करते थे लेकिन आपको कथित तौर पर आत्मनिर्भर बनाया गया !
जबसे गैस आई आपसे वन और आपकी गाय छीन ली गईं , जो मानव जीवन में कितनी सहायक हैं..शायद बताने की आवश्यकता न हो !
आगे फिर कभी...
✍️Baba Thakur Chandel
🙏नमस्तुभ्यं हे महेश्वराय
🚩ॐ सदाशिव शिव शिव शिवाय
❤️महेश्वर आप सभी का कल्याण करें
15/05/2020
!! स्व + देशी = स्वदेशी !!
स्वदेशी की अवधारणा एवं परंपरा कोई नई नही है...लेकिन प्रधानमंत्री के "आत्मनिर्भर" होने के आह्वाहन को लोग "स्वदेशी" अवधारणा से जोड़कर देख रहे रहे हैं !
एक आम व्यक्ति , सामाजिक नेता एवं राजनेता के कथन का अलग अलग अर्थ एवं संदर्भ होता है , स्वदेशी की अवधारणा नई नही है और अधिकतर हम सभी इससे परिचित हैं !
स्वदेशी का सामान्य अर्थ लगाया जाता है कि अपने देश के उत्पाद अर्थात अपने देश की संस्कृति , अपने देश की परंपरा अनुरूप वस्तुओं एवं सेवाओं का चयन एवं उपभोग को बढ़ावा देना !
मैं इसे व्यापक पैमाने पर देखने का आदी रहा हूँ , मेरी नजर में स्वदेशी का अर्थ है !
स्व :- मैं स्वयं को इतना सबल बनाऊं कि सामान्य वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए बाजार का भाग ही न बनना पड़े !
देशी :- जो वस्तुएं मेरी पहुंच से बाहर हैं अर्थात जिनका उत्पादन एवं निर्माण मैं नही कर सकता उसके लिए देशी बाजार में जाऊं , देशी अर्थात अपने ही देश के उद्यमियों द्वारा देशी कच्चे माल एवं साधनों से निर्मित उत्पादों का ही उपभोग करूँ !
इस तरह मेरे देश के संवर्द्धन में कुछ अंशदान मैं स्वयं भी दे सकूं...यह एक सशक्त एवं क्रांतिकारी विचारधारा है , जिसका पालन करना हर भारतवासी का धर्म है ! इससे अनेकों प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभ हैं !
कुछ भाइयों को देख रहा हूँ कि अनेकों उचित तथा अनुचित कारणों , तरीकों से वे इस आह्वाहन का मखौल उड़ा रहे हैं...उड़ाइये आपके अपने दृष्टिकोण हैं , अभिव्यक्ति की आज़ादी है , समर्थन और विरोध दोनों आवश्यक भी हैं लेकिन इसके चक्कर में आप स्वदेशी की विचारधारा का मजाक न बना दें...सावधान रहें !
इस विचारधारा का यही अर्थ नही है कि उपभोक्ता ही इसका अनुपालन करें , बल्कि यहां उत्पादकों पर भी यह उत्तरदायित्व है कि वे शुद्ध , सस्ती , गुणवंत वस्तुएं एवं सेवाएं दें...अगर आप किसी उत्पाद के मामले में ऐसा नही पाते तो स्वतंत्र हो जाते हैं कि आप अपने लिए सही उत्पाद का चयन करें....ऐसा मेरा व्यक्तिगत मत है कि स्वदेशी की विचारधारा जो कि पावन है उसे सामाजिक नेताओं ने विकृत रूप में पेश किया , जिससे यह भ्रम पैदा हुआ कि सारी आशाएं उपभोक्ता से ही हैं , वह गुणहीन महंगी वस्तुएं लेकर भी स्वदेशी का झंडा बुलंद करता रहे अथवा महंगी गुणवान वस्तुओं को झेले...सामान्यतः यहां मैं पाता हूँ कि स्वदेशी शब्द जुड़ते ही वस्तुएं महंगी हो जाती हैं , क्यों और कैसे इसपर फिर कभी चर्चा करेंगे !
खैर , मैंने मेरी समझ से स्वदेशी का जो अर्थ लगाया और उसके लिए क्या किया , आज यह बताना आरंभ करता हूँ...पसंद आये तो आप भी प्रयास करके देख लें और अगर नापसंद हो तो जैसे आपका मन चाहे वैसे ही करें...यह मात्र मेरा उदाहरण है , न कोई आह्वाहन और न किसी भी तरह आपका वैचारिक उत्पीड़न ही है !
मैं और हम सब अपने दिन का आरंभ करते हैं...मुख की सफाई से
और इसके लिए मेरे पास ढेरों अच्छे एवं सस्ते विकल्प हैं इस संदर्भ में मैं "स्व" का ही पालन करता हूँ !
1...नींबू + नमक
2...नमक + हल्दी + सरसों का तेल
3...नमक + हल्दी + मीठा सोडा या समय पड़े तो खाली मीठा सोडा या मीठा सोडा + नमक ही प्रयोग में ले लेता हूँ !
4...आम का पत्ता मिले या जामुन का पत्ता मिले या अमरूद का पत्ता मिल जाये या नीम की दातुन मिल जाये या अकरकरा की जड़ मिल जाये या अपामार्ग की जड़ मिल जाये तो वह भी
5...कुछ विशेष आयुर्वेदिक मंजन जो मैं स्वयं बनाता हूँ जो हर प्रकार से दांतों की सुरक्षा एवं स्वाद को वॄद्धि देने वाले होते हैं अगर आप चाहेंगे तो मैं कुछ मंजन के सूत्र आपको लिखकर दे सकता हूँ ! ऐसा करके मुझे खुशी होगी !
कुल मिलाकर मेरे दिन के प्रथम कार्य हेतु आवश्यक सामग्री हेतु मैं बाजार पर निर्भर ही नही हूँ !
धीरे धीरे मैं मेरे व्यक्तिगत विचारों से आपको स्वदेशी के सरल पालन का तरीका ऐसे ही छोटे छोटे सूत्रों में पिरोकर देना चाहूंगा... क्या आप मेरे साथ जुड़ना और जानना पसंद करेंगे ??
बताइएगा अवश्य....मात्र औपचारिकताएं नही चाहिए emojis की
✍️Baba Thakur
🙏नमस्तुभ्यं हे महेश्वराय
🚩सादर प्रणाम प्रियजनों
🌺महेश्वर सबकी रक्षा करें !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
14/05/2020
!! प्रेम !!
दिन का आरंभ *प्रेम* शब्द से कर पाऊं तो इससे सुंदर अन्य कोई बात नही हो सकती , क्योंकि जब मैं प्रेम की बात कर रहा हूँ तो यह ईश्वर के एक आयाम की बात हो रही है , और जिस क्षण ईश्वर की बात होती है वह क्षण दिव्य हो जाता है...पवित्र हो जाता है !
तो प्रेम को जितना मैंने जाना , वह कहता हूं !
ईश्वर का स्वभाव आनंद है , उसका सार आनंदमयी है , ऐसी उद्घोषणा हर साधक ने की है तो ऐसे सच्चिदानंद परमेश्वर की अभिव्यक्ति प्रेम है , यह प्रेम की शक्ति ही है जिससे सारा ब्रह्मांड जुड़ा हुआ है , प्रकाशमान है...इससे व्यापक अन्य कोई शब्द नही हो सकता लेकिन जिसे कुछ स्वघोषित विद्वानों ने कहा , जिसे कवियों ने आने श्रृंगार में रचा वह अन्य कुछ है लेकिन प्रेम नही है !
प्रेम की व्याख्या कभी एक प्रेमी नही कर सकता , इस पर तो केवल और केवल एक भक्त का अधिकार है ! यह नारायणास्त्र /पाशुपतास्त्र/ ब्रह्मास्त्र से भी बड़ा गहरा अदृश्य लेकिन अत्यंत प्रभावकारी मोहपाश है जो ईश्वर को भी बांध लेता है , वह ईश्वर जो सर्वशक्तिमान है , सर्वत्र है , सर्वज्ञ है !
भक्त होकर ईश्वर के इस आयाम से परिचित हुआ जा सकता है , जहां ईश्वर सदा एवं सतत रूप से प्रेम की अभिव्यक्ति करते हैं , वहीं भक्त सदा इसका अनुभव एवं अनुसरण करता है , जिसका प्रयास जितना अधिक होता है , इस महान भावना पर जिसका अधिक नियंत्रण होता है वह उतना ही बड़ा भक्त कहलाता है !
सामान्यजनों में इस पवित्र भाव का उदय यदाकदा होता है , इससे जो आनंद कभी उसके अंदर प्रकट हो जाता है...उसी को पाने और फिर न पाने की हताशा में वह कभी वासना को प्रेम का नाम दे बैठता है , कभी आकर्षण मात्र को प्रेम से तौलने का प्रयास करता है तो कभी ममत्व अथवा पितृत्व को प्रेम घोषित करके स्वयं को भ्रमित कर लेता है....शेष तो उसके अभिमान की घोषणा है !
ईश्वर जो स्वयं को मनुष्य के समक्ष अनेक रूपों में स्वयं को व्यक्त करता है , उसके रूपों के प्रति जब सामान्यजन स्वयं को समर्पित कर देता है तो वहां प्रेम का प्रकटीकरण हो जाता है , जैसे माता-पिता ईश्वर का ही रूप हैं तो माता-पिता को या बच्चों को अनेक बार प्रेम का आभास हो जाता है ! लेकिन यह भी कटु सत्य है कि बच्चे कुछ क्षण विशेष को छोड़कर सदैव बच्चे नही होते , ऐसे ही माता-पिता भी सदा माता-पिता नही होते क्योंकि हम स्वयं को अनेक रिश्तों / बंधनों में व्यक्त करते हैं यह हमारे अपनाए बहुरूप हैं !
जैसे पिता पुत्र का गुरु भी होता है , मित्र भी होता है , मार्गदर्शक भी होता है , दण्डक भी होता है , पालक तो है ही सो जब वह इन रूपों में होता है तो अनेक अन्य भाव उसे प्राप्त होते हैं और वह स्वयं अनेक भावों को प्राप्त होता है लेकिन प्रेम तो तब ही घटता है जब वह ईश्वर के रूप में बच्चे के सामने हो और बच्चा उसी समय भक्त के रूप में सामने हो ! यह बहुत सूक्ष्म बात है !
तो भक्त की शक्ति उसकी भक्ति होती है , भक्ति उसकी पूजा होती है अतः प्रेम को भक्ति या पूजा कहा जाता है !
🚩नमस्तुभ्यं हे महेश्वराय
✍️Baba Thakur
12/05/2020
बांस की बोतलें... श्रेष्ठ विकल्प है #प्लास्टिक नामक दानव का !
स्वदेशी के आह्वाहन की लाज भी है , स्वास्थ्यवर्धक एवं रक्षक भी है !
स्वास्थ्य हेतु भी , अर्थव्यवस्था हेतु भी...प्रियकर , मनभावक !
बांस की बोतल के पौषक तत्व : (Bamboo Bottle Nutrients)
-पोटेशियम 640 मिलीग्राम (13.62%)
-कॉपर 0.098 Mg (10.89%)
-विटामिन बी 6 (पाइरिडोक्सीन) 0.118 मिली ग्राम (9.08%)
-मैंगनीज, एमएन 0.136 मिलीग्राम (5.91%)
-विटामिन बी 2 (राइबोफ्लेविन) 0.06 मिलीग्राम (4.62%)
-ट्रिप्टोफैन 0.019 ग्राम (4.32%)
-प्रोटीन 1.84 ग्राम (3.68%)
-आइसोल्युसिन 0.061 ग्राम (3.65%)
-आयरन Fe 0.29 मिलीग्राम (3.63%)