हम छपरा से हैं

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एक गौरवान्वित भारतीय, एक मुसलमान, एक इतिहास प्रेमी, एक क्रिकेट और अन्य खेल प्रेमी, एक अलीगेरियन, एक सूफी संगीत प्रशंसक, एक बॉलीवुड प्रशंसक, राजनीतिक टिप्पणीकार, मानवतावादी, क्लासिक उर्दू कविता का एक उत्साही प्रशंसक,

05/06/2026

अमजद अली शाह: अवध का सौम्य बादशाह, जिसने लखनऊ को बाज़ारों और पुलों से संवारा। 1842 में जब अवध की गद्दी पर मुहम्मद अली शाह के बाद उत्तराधिकारी की ज़रूरत थी, तब उनके पुत्र अमजद अली शाह ने सत्ता संभाली। एक ऐसा शासक जिसने लखनऊ को आधुनिकता की ओर बढ़ाया।

🔹 जन्म: 30 जनवरी 1801 से पहले, लखनऊ
🔹 शासनकाल: 7 मई 1842 – 13 फ़रवरी 1847
🔹 ताजपोशी: फ़रहत बख्श पैलेस, लखनऊ
🔹 उत्तराधिकारी: वाजिद अली शाह
🔹 निधन: 13 फ़रवरी 1847, कैंसर से
🔹 समाधि: इमामबाड़ा सिब्तैनाबाद, हज़रतगंज, लखनऊ

🏛️ प्रमुख योगदान:
▫️ हज़रतगंज और अमीनाबाद बाज़ार की स्थापना
▫️ गोमती नदी पर नया पुल बनवाया
▫️ लखनऊ से कानपुर तक पक्की सड़क का निर्माण
▫️ शिया शिक्षा के लिए इमामबाड़ा परिसर में कॉलेज की स्थापना

👨‍👩‍👦 परिवार:
▫️ पत्नी: मलिका किश्वर ताज आरा बेगम
▫️ पुत्र: वाजिद अली शाह (अवध के अंतिम स्वतंत्र शासक)

📜 अमजद अली शाह का शासनकाल छोटा था, लेकिन उन्होंने लखनऊ को व्यापार, शिक्षा और स्थापत्य की दृष्टि से समृद्ध किया।
🕌 उनकी समाधि आज भी हज़रतगंज में इतिहास की गवाही देती है।

#अमजदअलीशाह #अवधकेबादशाह #हज़रतगंज #अमीनाबाद #लखनऊइतिहास #इतिहासकीझलक

05/06/2026

हमिदा बानो: भारत की पहली महिला पहलवान, जिसने इतिहास रच दिया**अगर आप सोचते हैं कि कुश्ती सिर्फ पुरुषों का खेल है, तो **हमिदा बानो** की कहानी आपको दोबारा सोचने पर मजबूर कर देगी। उन्हें कहा जाता है **"अलीगढ़ की ऐमज़ॉन"**, और उन्होंने 1950 के दशक में वो कर दिखाया जो उस दौर में कोई महिला सोच भी नहीं सकती थी।

**संक्षिप्त जीवन परिचय**:
- **जन्म**: 1900 के दशक की शुरुआत में, अलीगढ़, उत्तर प्रदेश
- **उपाधि**: "Amazon of Aligarh"
- **प्रसिद्धि**: भारत की पहली पेशेवर महिला पहलवान
- **शादी का प्रस्ताव**: "जो मुझे हराएगा, मैं उससे शादी करूंगी" — ये चुनौती उन्होंने 1954 में दी थी

**कुश्ती में अद्भुत उपलब्धियाँ**:
- **300+ मुकाबले जीते**, जिनमें कई पुरुष पहलवान भी शामिल थे
- **बाबा पहलवान** को 1954 में मात्र **1 मिनट 34 सेकंड** में हराया — इसके बाद उन्होंने रिटायरमेंट ले लिया
- **अंतरराष्ट्रीय स्तर** पर भी मुकाबले किए — एक रूसी महिला पहलवान को **2 मिनट से कम** समय में हराया

**डाइट और ट्रेनिंग**:
- उनकी डाइट और ट्रेनिंग उस समय के अख़बारों में छपती थी
- वो रोज़ाना घंटों अभ्यास करती थीं और ताकतवर शरीर के लिए खास खानपान अपनाती थीं

**निजी जीवन**:
- बाद में उन्होंने महाराष्ट्र के कल्याण में जीवन बिताया
- दूध बेचना, स्नैक्स बनाना और किराए पर मकान देना — यही उनके जीवनयापन के साधन थे

**विरासत और प्रेरणा**:
हमिदा बानो सिर्फ एक पहलवान नहीं थीं — वो एक **क्रांति** थीं। उन्होंने समाज की रूढ़ियों को चुनौती दी और दिखाया कि **हिम्मत, मेहनत और जुनून** से कोई भी सीमा पार की जा सकती है।

अगर आपको हमिदा बानो की कहानी प्रेरणादायक लगी, तो इस पोस्ट को लाइक करें और शेयर करें ताकि उनकी विरासत और भी लोगों तक पहुंचे!

05/06/2026

नदीम–श्रवण: 90 के दशक की सबसे सफल संगीत जोड़ी!**अगर आप बॉलीवुड के रोमांटिक और भावनात्मक गीतों के दीवाने हैं, तो **नदीम–श्रवण** की जोड़ी आपके दिल में खास जगह रखती होगी। इन दोनों ने मिलकर हिंदी सिनेमा को **संगीत का स्वर्ण युग** दिया, खासकर **1990 से 2005** के बीच।

**संक्षिप्त परिचय:**
- **नदीम सैफी**: जन्म – 6 अगस्त 1954, मुंबई
- **श्रवण कुमार राठौड़**: जन्म – 13 नवंबर 1954 | निधन – 22 अप्रैल 2021
- सक्रिय वर्ष: **1977–2005**, फिर **2009 और 2016–वर्तमान**
- प्रमुख सम्मान: **पद्म भूषण (2024)** प्यारेलाल को, श्रवण को श्रद्धांजलि स्वरूप कई पुरस्कार

**प्रसिद्ध फिल्में और एल्बम:**
- *आशिकी* (1990) – 20 मिलियन यूनिट बिकी, अब तक की सबसे ज़्यादा बिकने वाली बॉलीवुड एल्बम
- *साजन*, *राजा हिंदुस्तानी*, *पर्देस*, *धड़कन*, *राज़*, *दिलवाले*, *सिर्फ तुम*, *कसूर*, *हम हैं राही प्यार के*

**संगीत की विशेषताएं:**
- भारतीय शास्त्रीय संगीत का आधुनिक प्रयोग
- बांसुरी, सितार और शहनाई का खूबसूरत उपयोग
- कुमार सानू, अलका याग्निक, उदित नारायण जैसे गायकों के साथ अमर गीतों की रचना

**वियोग और श्रद्धांजलि:**
- **श्रवण राठौड़** का निधन **कोविड-19** के कारण हुआ
- नदीम ने कहा: “हमने साथ में ज़िंदगी देखी, ऊँचाइयाँ और गिरावटें देखीं। अब एक खालीपन रह गया है।”

नदीम–श्रवण का संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं था — वह **भावनाओं की गहराई**, **प्रेम की मिठास**, और **संगीत की आत्मा** था। उनकी रचनाएं आज भी दिलों को छूती हैं और रेडियो पर गूंजती हैं।

अगर आप भी इस अमर जोड़ी के प्रशंसक हैं, तो इस पोस्ट को लाइक करें, शेयर करें और कमेंट में बताएं – आपका पसंदीदा नदीम–श्रवण गीत कौन सा है?

05/06/2026

रजिया सुल्तान: भारत की पहली महिला शासक!! रजिया सुल्तान (1205 - 15 अक्टूबर 1240), दिल्ली सल्तनत की पहली और एकमात्र महिला सुल्तान (1236-1240)। अपने पिता इल्तुतमिश की उत्तराधिकारी, उन्होंने साहस और बुद्धिमत्ता से शासन किया और रूढ़ियों को चुनौती दी।

**मुख्य उपलब्धियाँ:**
- 1236: दिल्ली सल्तनत की सुल्तान के रूप में ताजपोशी
- शिक्षा और प्रशासन में सुधार, निष्पक्ष न्याय व्यवस्था
- घुड़सवारी और युद्धकला में निपुण
- लाहौर और भटिंडा में विद्रोहियों के खिलाफ युद्ध

उनका शौर्य और नेतृत्व भारतीय इतिहास में अमर है।

05/06/2026

क़ुतुबुद्दीन ऐबक गुलाम से सुल्तान तक का सफ़र* “इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो पत्थरों में अपनी पहचान छोड़ जाते हैं।”
क़ुतुबुद्दीन ऐबक (1150–1210) एक तुर्क मूल के योद्धा थे, जिन्हें मुहम्मद गोरी ने एक गुलाम के रूप में खरीदा था। लेकिन उनकी योग्यता, निष्ठा और युद्ध कौशल ने उन्हें भारत में तुर्क शासन की नींव रखने वाला पहला सुल्तान बना दिया।

🔹 जन्म: 1150, तुर्किस्तान
🔹 प्रारंभिक जीवन: गुलाम के रूप में शुरुआत, घुड़सवारी और धनुर्विद्या में दक्षता
🔹 संरक्षक: मुहम्मद गोरी
🔹 प्रमुख युद्ध: तराइन द्वितीय युद्ध (1192), चंदावर, कालिंजर
🔹 शासनकाल: 1206–1210 ई.
🔹 राजधानी: लाहौर
🔹 स्थापत्य योगदान: क़ुतुब मीनार (दिल्ली), अढ़ाई दिन का झोपड़ा (अजमेर)
🔹 निधन: घुड़सवारी के दौरान दुर्घटना में, 1210 ई., लाहौर
🔹 उत्तराधिकारी: आरम शाह, फिर इल्तुतमिश

उनकी कहानी सिर्फ एक सुल्तान की नहीं, बल्कि एक गुलाम की है जिसने इतिहास को अपने नाम से गढ़ा।

📜 “क़ुतुब मीनार सिर्फ एक इमारत नहीं, एक गुलाम की उड़ान है।”_

05/06/2026

ये तस्वीर बैरम खान की है। वो शख़्स जिसने हुमायूँ की मौत के बाद हिन्दोस्तान में मुग़ल सल्तनत की बुनियाद को दोबारा यकीनी बनाया था। आज बैरम खां का ज़िक्र करने की एक खास वजह है, दरअस्ल आज के दिन ही 31 जनवरी 1561 में एक अफ़ग़ान सरदार ने गुजरात में बैरम खां का कत्ल कर दिया था। इस अफ़ग़ान सरदार के पिता को बैरम खान ने एक जंग में क़त्ल किया था। दरअस्ल बैरम खान शहंशाह अकबर के हुक्म से हज के सफर के लिए मक्का जा रहे थे।
बैरम खान को मुग़ल बादशाह बाबर ने अपने बेटे हुमायूँ के साथ बेटे की तरह पाला था। बाद में बैरम खान ने अक़बर की अपने बेटे की तरह हिफ़ाज़त की और ज़िन्दगी भर साए की तरह हुमायूँ के दोस्त बन कर रहे। बैरम खान ही थे जिसकी वजह से मुगलों ने हेमू जैसे ताक़तवर राजा को हराकर वापस दिल्ली पर क़ब्ज़ा किया। बैरम खान हुमायूँ के साढ़ू, अकबर के मंत्री और अब्दुल रहीम खानेखाना के वालिद भी थे।
बैरम खान ने मुगलों के लिए कई जंग फतह की। जब हुमायूँ ने चांपानेर (गुजरात) के क़िले पर घेरा डाला। किसी तरह से दाल ग़लती न देखकर चालीस मुग़ल जंगजू सीढ़ियों के सहारे क़िले में कूद गए, जिनमें बैरम ख़ाँ भी थे क़िला फ़तह कर लिया गया। शेरशाह से चौसा की जंग में लड़ते वक़्त बैरम ख़ाँ भी साथ ही थे। पानीपत के जंग में बैरम खान ही थे। कन्नौज की जंग में भी वही लड़े। इन सभी घटनाओं ने हुमायूँ और बैरम ख़ाँ को एक खास दोस्ती के बंधन में बाँध दिया था।
आसान शब्दों मे कहे तो वो मुग़लो के कटप्पा थे जिसने अपनी सारी ज़िन्दगी एक वफादार बनकर उनकी हिफाज़त में गुज़ार दी।

05/06/2026

मलिका-ए-तरन्नुम: नूर जहां**अगर किसी एक आवाज़ ने भारतीय उपमहाद्वीप के संगीत को नई ऊँचाइयाँ दीं, तो वो हैं **नूर जहां** — जिन्हें प्यार से "मलिका-ए-तरन्नुम" यानी "संगीत की रानी" कहा जाता है। उनका जन्म **21 सितंबर 1926** को **कसूर, पंजाब** में हुआ था और उन्होंने अपने जीवन के **70 वर्षों** से अधिक समय संगीत को समर्पित किया।

**महत्वपूर्ण आंकड़े और उपलब्धियाँ:**
- **रिकॉर्ड किए गए गीत:** 10,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए
- **फिल्में:** 40 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया
- **पहली महिला फिल्म निर्देशक** बनीं पाकिस्तान की
- **सम्मान:**
- "Voice of the Century" का खिताब पाकिस्तान टेलीविज़न द्वारा
- मलिका-ए-तरन्नुम की उपाधि

**संगीत यात्रा:**
- बचपन में **उस्ताद बड़े गुलाम अली खान** से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली
- 1930 के दशक में कोलकाता में थिएटर से करियर की शुरुआत
- भारत विभाजन से पहले हिंदी फिल्मों में अभिनय और गायन किया — *अनमोल घड़ी*, *जुगनू* जैसी फिल्मों में यादगार भूमिकाएँ
- विभाजन के बाद पाकिस्तान में संगीत और फिल्म उद्योग को नई दिशा दी

**व्यक्तिगत जीवन:**
- पहला विवाह: **शौकत हुसैन रिज़वी** से, जिनसे तीन बच्चे हुए
- दूसरा विवाह: **एजाज़ दुर्रानी** से, जो उनसे 9 साल छोटे थे

**निधन:** 23 दिसंबर 2000 को **कराची** में दिल की बीमारी के कारण उनका निधन हुआ

नूर जहां की आवाज़ में वो मिठास थी जो दिल को छू जाती थी और आत्मा को सुकून देती थी। उन्होंने ग़ज़ल, ठुमरी, लोकगीत और फिल्मी गीतों को अपनी शैली में ढालकर अमर बना दिया।

05/06/2026

ये 1857 के वो महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं जिनके सर काटकर अंग्रेजों ने इनके पिता के आगे पेश किए थे....तस्वीर में बहादुर शाह ज़फ़र के दो युवा बेटों मिर्ज़ा जवां बख़्त (बाएं) और मिर्ज़ा शाह अब्बास (दाएं) को देखा जा सकता है, अंग्रेजी क़ैद में शहज़ादों की ये तस्वीर 1858 से 1860 के बीच मे ली गई है...
.. बाद में इन्हीं शहज़ादों को अंग्रेजों ने खूनी दरवाज़े के पास क़त्ल करके इनके सर कटवा कर बहादुर शाह जफर के सामने ला रखे थे....
इन्हीं दो शहज़ादों की "कुरूपता" का आज कुछ मूर्ख लोग मज़ाक़ उड़ाते हैं....
वैसे क्या बात इन सुंदर नौजवानों को कुरूप दिखाती है इनकी ब्राउन स्किन ??
शुरुवाती कैमरे यूरोपीय लोगों की सफेद त्वचा के रंग को कैप्चर करने के लिए बने थे, तब अलग अलग त्वचा रंगों के अनुसार कैमरे को एडजस्ट करने की तकनीक नही थी, इसीलिए शुरुवाती समय में खींची गई तस्वीरों में भारतीयों का रंग अमूमन बेहद काला नज़र आता है, जबकि वास्तव में हम भारतीय गेंहुए और सांवले होते हैं, उतने काले नही जितने 19वीं सदी की तस्वीरों में नज़र आते हैं
तो ये शहज़ादे वास्तव में सांवले और गेंहुए रंग के थे, और साँवला और गेहुआँ रँग कुरूप नही होता, .... कुरूप तो काला रंग भी नही होता, पर कैमरे के बारे में एक तथ्य जो आप नही जानते होंगे, वो मैंने बताना जरूरी समझा !

... दूसरी बात इन शहज़ादों की फोटो अंग्रेजी कैद में खींची गई है, शहज़ादों को आप हुलिया व्यवस्थित करने की सुविधा नही दी गई, उनके बाल बिखरे और रूखे हैं, उनके कपड़े बहुत साधारण हैं, जिस्म पर कोई भी राजसी चिन्ह नही रहने दिया गया है, एक दो वर्षों के संघर्ष और क़ैद की कड़ी परिस्थितियों में उनके शरीर भी दुबले पतले हो चुके हैं..... ऐसे में अच्छे अच्छों की सुंदरता मिट जाती है, .... लेकिन इसके बावजूद इन कुम्हलाए चेहरों पर वतन के लिए शहीद हो जाने के जज़्बे का जो तेज, जो तजल्ली है.... उसके आगे सारी सुंदरताएँ फेल हैं....

... सोचकर देखिये, ये कोमल चेहरे कभी फूलों के बिस्तर पर सोते थे, और फिर एक दिन क्रूर अंग्रेजों ने इनके सर काट दिए, इसलिए क्योंकि ये देश की गरीब जनता की मांग पर अंग्रेज विरोधी क्रांति के अगुवा बने थे..... चाहते तो अंग्रेजों की चाटुकारी करके अपना जीवन बचा सकते थे, ....लेकिन वो शहीद हुए, आपके और मेरे देश की आज़ादी के लिए

05/06/2026

बहादुरशाह ज़फर के सामने थाल लाया गया। हडसन ने तश्त पर से ग़िलाफ हटाया। कोई और होता तो शायद ग़श खा जाता या नज़र फेर लेता । लेकिन ज़फर ने ऐसा कुछ नहीं किया। थाल मे रखे जवान बेटों के कटे सिरों को इत्मीनान से देखा। हडसन से मुख़ातिब हुए और कहा...
'वल्लाह... नस्ले 'तैमूर' के चश्मो चराग़ मैदाने जंग से इसी तरह सुर्ख़रू होकर अपने बाप के सामने आते हैं। हडसन तुम हार गए और हिंदुस्तान जीत गया।'
(1857 की पहली जंगे आज़ादी)

05/06/2026

Delhi Gate और Lahore Gate: दो शहर, एक विरासत**इतिहास की गलियों में जब हम चलते हैं, तो Delhi Gate और Lahore Gate जैसे द्वार सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि समय के साक्षी बनकर खड़े मिलते हैं।

**Delhi Gate, Lahore**
- निर्माण: 17वीं शताब्दी, मुग़ल सम्राट शाहजहाँ के शासन में
- उद्देश्य: दिल्ली की ओर खुलने वाला मुख्य प्रवेश द्वार
- विशेषताएं: दो मंज़िला संरचना, 10–12 दुकानों की जगह, छत तक सीढ़ियाँ
- पास के स्थल: वज़ीर खान मस्जिद, शाही हमाम, अकबरी मंडी
- पुनर्निर्माण: ब्रिटिश राज में 19वीं शताब्दी में
- आज: रात्रि में रोशनी से जगमगाता सांस्कृतिक स्थल

**Lahore Gate, Delhi**
- निर्माण: 1648, लाल किले के मुख्य द्वार के रूप में
- उद्देश्य: मुग़ल सम्राटों की राजधानी का प्रवेश द्वार
- ऐतिहासिक महत्व: यहीं से स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं
- वास्तुशिल्प: लाल बलुआ पत्थर से निर्मित, भव्य और विशाल
- आज: राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक, लाल किले का मुख्य द्वार

**भावनात्मक झलक:**
Delhi Gate और Lahore Gate — दोनों ने सदियों तक राजाओं, आम जनों, और क्रांतियों को आते-जाते देखा है। एक ने मुग़ल राजधानी की शान बढ़ाई, तो दूसरा भारत-पाक विरासत का जीवंत प्रतीक बना।

**विरासत:**
ये द्वार सिर्फ शहरों के प्रवेश नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों में दर्ज वो दरवाज़े हैं जो हमें हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते हैं।

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