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Read - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव् 01/07/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*
*दूसरों के साथ वह व्यवहार न करेंगे, जो हमें अपने लिए पसंद नहीं।*

कोई व्यक्ति अपनी जरूरत के वक्त कुछ उधार हमसे ले जाता है तो हम यही आशा करते हैं कि आड़े वक्त ही इस सहायता को सामने वाला व्यक्ति कृतज्ञता पूर्वक याद रखेगा और जल्दी से जल्दी इस उधार को लौटा देगा। यदि वह वापिस देते वक्त आंखें बदलता है तो हमें कितना बुरा लगता है। यदि इसी बात को ध्यान में रखा जाय और किसी के उधार को लौटाने के लिए अपनी आकांक्षा के अनुरूप ही ध्यान रखा जाय तो कितना अच्छा हो। हम किसी का उधार आवश्यकता से अधिक एक क्षण भी क्यों रोक रखें।
हम दूसरों से यह आशा करते हैं कि वे जब भी कुछ कहें या उत्तर दें, नम्र शिष्ट, मधुर और प्रेम भरी बातों से सहानुभूति पूर्ण रुख के साथ बोलें। कोई कटुता, रुखाई निष्ठुरता, उपेक्षा और अशिष्टता के साथ जवाब देता है तो अपने को बहुत दुख होता है। यदि यह बात मन में समा जाय तो फिर हमारी वाणी में सदा शिष्टता और मधुरता ही क्यों न घुली रहेगी?

*क्रमशः* *........*
-LITERATUREGURUDEV .

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Read - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव् 27/06/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*

जब हम रेल में चढ़ते हैं और दूसरे लोग पैर फैलाये बिस्तर जमाये बैठे होते हैं तो हमें खड़ा रहना पड़ता है। उन लोगों से पैर समेट लेने और हमें भी बैठ जाने देने के लिए कहते हैं तो वे लड़ने आते हैं। झंझट से बचने के लिए हम खड़े-खड़े अपनी यात्रा पूरी करते हैं और मन ही मन उन जगह घेरे बैठे लोगों की स्वार्थपरता और अनुदारता को कोसते हैं। पर जब हमें जगह मिल जाती है। तो हम भी वैसा ही व्यवहार करते हैं। उसी तरह पैर फैला लेते हैं और नये यात्रियों के प्रति ठीक वैसे ही निष्ठुर बन जाते हैं। क्या यह दुहरा दृष्टिकोण उचित है?
हमारी कन्या विवाह योग्य हो जाती है तो हम चाहते हैं कि लड़के वाले बिना दहेज के सज्जनोचित व्यवहार करते हुए विवाह सम्बन्ध स्वीकार करें, दहेज मांगने वालों को बहुत कोसते हैं। पर जब अपना लड़का विवाह योग्य हो जाता है तो हम भी ठीक वैसा ही अनुदारता दिखाते हैं जैसी अपनी लड़की के विवाह अवसर पर दूसरों ने दिखाई थी। कोई हमारी चोरी, बेईमानी कर लेता है, ठग लेता है तो बहुत बुरा लगता है, पर प्रकारान्तर से वैसी ही नीति अपने कारोबार में हम भी बरतते हैं और तब उस चतुरता पर प्रसन्न होते और गर्व अनुभव करते हैं। यह दुमुंही नीति बरती जाती रही तो मानव समाज में सुख-शान्ति कैसे कायम रह सकेगी?

*क्रमशः* *........*
-LITERATUREGURUDEV .

Read - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव् हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन ....

Read - हम आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानेंगे। - हम आस्तिकता और कर्तव् 26/06/2026

*AWGP- LITERATURE GURUDEV*
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!
*युग निर्माण सत्-संकल्प की दिशा-धारा*

हम चाहते हैं कि दूसरे लोग हमारे साथ सज्जनता का, उदार और मधुर व्यवहार करें जो हमारी प्रगति में सहायक हो और ऐसा कार्य न करें जिससे प्रसन्नता और सुविधा में किसी प्रकार का विघ्न उत्पन्न हो। ठीक ऐसी ही आशा दूसरे लोग भी हम से करते हैं?
जब हम ऐसा सोचते हैं कि अपने स्वार्थ की पूर्ति में कोई आंच न आने दी जाय और दूसरों से अनुचित लाभ उठा लें, तो वैसी ही आकांक्षा दूसरे भी हम से क्यों न करेंगे? लेने और देने के दो बांट रखने में ही सारी गड़बड़ी पैदा होती है। यदि यही ठीक है कि हम किसी के सहायक न बनें, किसी के काम न आवें, किसी से उदारता नम्रता और क्षमा की नीति न बरतें तो इस के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि दूसरे लोग हमारे साथ वैसा ही धृष्टता बरतेंगे तो हम अपने मन में कुछ बुरा न मानेंगे।

*क्रमशः* *........*
-LITERATUREGURUDEV .

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